हमारे संविधान में ऐसे कई प्रावधान है जिनका मकसद है सरकार पर लगाम रखना. संविधान में ‘लिमिटेड गवर्नमेंट’ का आइडिया अहम है

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पिछले दो-तीन महीनों में केंद्र सरकार ने पचास से ज़्यादा सरकारी योजनाओं और सुविधाओं के लिए आधार नंबर को अनिवार्य कर दिया है :

आधार 12 अंकों का पहचान पत्र है, जिसे बायोमीट्रिक्स यानी उंगलियों के निशान, आँखों की पुतली और फोटोग्राफ से जोड़ा गया है.साल 2009 में यूपीए-2 के समय में, जब यह सरकारी प्रोजेक्ट शुरू हुआ, तब सरकारी तंत्र ने बार-बार आश्वासन दिया की यह वैकल्पिक है और इसे अनिवार्य नहीं बनाया जाएगा .फिर धीरे-धीरे सरकार ने पीछे के दरवाजे से इसे नरेगा के तहत काम का अधिकार और पेंशन हासिल करने के लिए अनिवार्य कर दिया .जब उच्चतम न्यायालय ने सितंबर 2013 में कहा कि इसकी वजह से लोगों को उनके हक़ से वंचित नही किया जा सकता, तब ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक होशियार अफ़सर ने सरकार के लिए रास्ता निकाला.

सरकारी आदेशों में पहली पंक्ति में न्यायालय के आदेश को लिखा जाता और साथ-ही दूसरी पंक्ति में लिख दिया गया- यदि आधार नंबर नही है, तो उस व्यक्ति की आधार पंजीकरण में मदद की जाए .कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती- जैसे सुप्रीम कोर्ट का आदेश मंत्रालय में आते-आते इस तरह मरोड़ा गया, उसी तरह, मंत्रालय का आदेश (लोगों को आधार में पंजीकृत किया जाए), ज़िले तक पहुंचते-पहुंचते और भी मरोड़ा गया. नतीजा यह हुआ की जिनके पास आधार नहीं था, उनका नाम धीरे-धीरे कटता गया. जैसे-जैसे लोगों के नाम आधार ना होने की वजह से, उनकी जानकारी के बिना कटते गए, सरकार ने दावा करना शुरू किया की यह लोग ‘फ़र्ज़ी’ थे जो आधार की वजह से पकड़े गए हैं.इन्हीं ग़लत तरीके से कटे हुए नामों को सरकार ज़ोरों-शोरों से ‘आधार से हुई बचत’ के रूप में देश के सामने प्रस्तुत करती आ रही है. अदालत और संसद दोनों जगह आधार से बचत के जो आंकड़े हैं उसमें बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो ग़लत तरीके से सरकारी हकों से वंचित हो गए हैं. इसी के चलते, सरकार ने अब आदेश निकाल दिया है की आयकर भरने के पैन कार्ड को अनिवार्य रूप से आधार नंबर से जोड़ना होगा, यदि ऐसा नही किया गया तो पैन रद्द कर दिया जाएगा और पैन कार्ड बनवाने के लिए भी सरकार ने आधार को अनिवार्य कर दिया है .

इसी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की पिछले हफ्ते जस्टिस सीकरी और जस्टिस भूषण ने सुनवाई की.जब कोर्ट को बताया गया कि यह कदम कितना हानिकारक है तो तुरंत जस्टिस सीकरी ने अटॉर्नी जनरल से इसकी वजह पूछी . इसके पीछे तर्क क्या है सरकार इसे अदालत में ठीक से नहीं बता पा रही है. अटॉर्नी जनरल ने यह कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश अब लागू नहीं हैं क्योंकि वो आदेश आधार क़ानून ना होने की वजह से दिए गए थे .तब याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि आदेश इस वजह से नहीं थे. कोर्ट ने आधार को अनिवार्य नहीं बनाने का आदेश अन्य कारणों से भी दिया था और सबसे बड़ा कारण ये गिनाया था कि आधार नहीं होने के कारण कोई भी अपने हक़ से वंचित न रह जाए . फिर ये तर्क दिया गया कि बड़ी संख्या में डुप्लिकेट पैन नंबर हैं जो आधार से पकड़े जाएंगे, लेकिन मार्च 2016 में लोक सभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, डुप्लिकेट होने की वजह से केवल 0.4 प्रतिशत पैन कार्ड काटे गए हैं. यदि केवल 0.4 प्रतिशत पैन डुप्लिकेट या ग़लत पाए गए, तो सरकार का पैन को आधार से लिंक करने का प्रस्ताव घर से चूहा भगाने के लिए घर को आग लगा देने के बराबर है. दूसरी बात, कम संख्या में ही सही कुछ आधार भी डुप्लिकेट या फर्जी पाए गए हैं. तीसरा, लोक सभा में सरकार ने कहा है कि पैन डेटाबेस में मां का नाम जोड़ने से भी डुप्लिकेसी के मामले सामने आ सकते हैं. यानी डुप्लिकेट / फ़र्ज़ी पैन कार्ड पकड़ने के और तरीके भी हैं .पिछले कुछ दिनों में कई सरकारी वेबसाइट पर लोगों के आधार नंबर सार्वजनिक किए गए हैं, जो कि क़ानून के ख़िलाफ है. यदि यह नंबर ग़लत हाथों में पड़ जाएँ तो इनका दुरुपयोग होने की आशंका है. हमारे संविधान में ऐसे कई प्रावधान है जिनका मकसद है सरकार पर लगाम रखना. संविधान में ‘लिमिटेड गवर्नमेंट’ का आइडिया अहम है.’लिमिटेड गवर्नमेंट’का मतलब है सरकारी दायरे की सीमाएँ तय करना. लोकतंत्र में यह बहुत ज़रूरी है, क्योंकि सरकारी दायरा हद से ज़्यादा बढ़ेगा, तो लोगों की निजी ज़िंदगी में दखलंदाज़ी बढ़ेगी, सेल्फ़-सेंसरहिप होगी, और जब सेल्फ़-सेंसरहिप होगी तो यह तो लोकतंत्र की जड़ों पर घातक वार होगा.

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