गुस्से और नाराज़गी की आवाज़ यानी दुष्यंत कुमार के जन्मदिन पर ख़ास

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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

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ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती

ज़िन्दगी है कि जी नहीं जाती

इन सफ़ीलों में वो दरारे हैं

जिनमें बस कर नमी नहीं जाती

देखिए उस तरफ़ उजाला है

जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती

शाम कुछ पेड़ गिर गए वरना

बाम तक चाँदनी नहीं जाती

एक आदत-सी बन गई है तू

और आदत कभी नहीं जाती

मयकशो मय ज़रूर है लेकिन

इतनी कड़वी कि पी नहीं जाती

मुझको ईसा बना दिया तुमने

अब शिकायत भी की नहीं जाती

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